Thursday, September 15, 2016

महक हूँ चन्दन नहीं हूँ

आर्त हूँ क्रंदन नहीं हूँ
अर्चना वंदन नहीं हूँ
भुक्ति हूँ भोगी नहीं हूँ
युक्त हूँ योगी नहीं हूँ

समर से भागा नहीं हूँ
सुसुप्ति में जागा नहीं हूँ
लिप्त हूँ बंधन नहीं हूँ
महक हूँ चन्दन नहीं हूँ

राव जैसा रण नहीं हूँ
भीष्म जैसा प्रण नहीं हूँ
राम जैसा भी नहीं पर
सुमित्रा नंदन नहीं हूँ .

शोषितों में भी नहीं हूँ
पौषितों में भी नहीं हूँ
रोषितों जैसा नहीं पर
समन्दर मंथन नहीं हूँ

तय विजय न हार हूँ मैं
खुला यमका द्वार हूँ मैं
हर घडी जो मिट रहा है
स्वप्नमय संसार हूँ मैं

Saturday, September 3, 2016

कल कब आये - पर आज गया .

कुछ पाने को - सब खोना है
नारी जीवन का रोना है .
बाहर पाया - पर घर छुटा
मुरझाया घरका हर बूटा .

गमलों में ये खिलती क्यारी
कितनी कुम्हलाई फुलवारी
टूटे सपने गम देते हैं -
घर होटल का भ्रम देते है .

आओ रात्रि विश्राम करो -
भागो सुबह और काम करो .
ना पाया - घरका राज गया .
कल कब आये - पर आज गया .

मरे हुओं को यार क्या रोना .

दिलकी यारा यही गुजारिश है 
खफा मुझसे कभी नहीं होना .
तेरी खुशबुसे गुलज़ार हुआ
मेरे दिलका सनम हरेक कोना .

ना आये आँखों में कभी सपने
ऐसा सोना भी यार क्या सोना .
बहते दृग तोड़ डालें बंद सभी
बूंदकी तरह यार क्या रोना .

ढूंढा तुमको पर ना मिले कहीं 
दिलमें झूठी तसल्ली क्या होना 
पा लिया होता तो खो गये होते - 
कभी पाया न उसका क्या खोना .

जिन्दगी जिन्दा सवाल होती है 
सोच लो जिसका तुमको है होना 
विगत तो भूत बला होते हैं -
मरे हुओं को यार क्या रोना .