Sunday, January 31, 2016

इक कलिसे हार बैठा था भ्रमर .

भौरका तारा दिखा और दिन हुआ
ख़ास यूँ तो बात - कोई है नहीं
धूप चारो और है छिटकी हुई
चांदनी सी रात कोई है नहीं .

नवगृह और तारसप्तक तू बता
क्यों ढूलाये जारहे आखिर चंवर
चौक पूरे और मंगलगान थे -
इक कलिसे हार बैठा था भ्रमर .

पुष्प कुछ मुरझाये सेहरेकी अभी
गये दिन वो आज बीती बात है .
रंगनी का संग मधुरिम है बना -
आज जीवन संगिनी जो साथ है .

( विवाहकी 37वीं वर्षगाँठ पर)

No comments:

Post a Comment