Thursday, January 11, 2018

डाल पजामा नाड़े में

गर्मी फिरभी कट जाए
धूप मुफ्त ले जाड़े में
जूतोंकी अब मौज नही
चप्पल चली अखाड़े में
इज्जत जाती दिख रही
डाल पजामा नाड़े में

माया ममता कहीं नहीं
साइकिल चलती भाड़े में
गणित हुआ अब फेल सखे
पानी नहीं फुहारे में
पप्पू लिख दे हारे में
मोदी लिख दे सारे में

युवा पीढ़ी क्या कहने
लिखो प्रेम के मारे में
प्यार कोई आसान नहीं
मिले प्रेमिका भाड़े में
भीड़ बड़ी हैरान लगे
नज़रें नहीं नज़ारे में

खतमें खता नहीं लिखना
लिख मत मोदी हारे में
पप्पूजी युवराज बने
लालू बंदी चारे में
खुले छुट्टे सांड फ्री
बंधा आदमी बाड़े में

Sunday, December 17, 2017

अनपढ़ी सी इक कहानी हूँ

अनपढ़ी सी इक कहानी हूँ 
याद दुनियाको मुह्ज़ुबानी हूँ 

जुबांसे कुछ भी कह नहीं पाई 
न कोई लोमड़ी सयानी हूँ 

किसीकी निगाह में हूँ और 
किसीकी निगहबानी हूँ  

करो ना याद आजाउंगी मैं  
तेरे दिलकी अमिट निशानी हूँ 


Friday, December 8, 2017

हे धर्मराज अभी तुम दूसरा कोई घर देखो


थामने हैं कई हाथ
कई जाने अभी बचानी हैं
किसीकी सिंदूर की डिब्बी
खोयी उसे पहुचानी है 

कई किश्तियाँ चली थी
जो लौट अभी आनी हैं
बहूत सी उलझने बाकी
जो मुझे सुलझानी हैं

बहूत सी ग़ज़ल बाकी
जो जमाने को सुनानी हैं
कई अनकहे अफ़साने
कई पुरानी कहानी हैं

बहुत से वायदे अधूरे हैं
भरने हैं कई घाव -
कुछ तो पूर्ति कर दूं
जो अभी आधे अधूरे हैं

यहाँ मरने की फुर्सत कहाँ
कोई दूसरा नगर देखो
हे धर्मराज अभी तुम
दूसरा कोई घर देखो

Friday, December 1, 2017

मैं रूखी रोटी खाता हूँ

लिखने से रोटी चलती है
लिखने पे गाली खाता हूँ
मैं भक्त नहीं हूँ मोदी का
ये आज तुम्हें बतलाता हूँ

अब मेरी छोड़ कहो अपनी
क्यों भौंक रहे पट्टा पहने
न कज़री जैसी बात करू
ना मोदी सा इतराता हूँ

माया ममता पप्पू लालू
मैं सबपे कलम चलाता हूँ
सरहद न खींची है कोई
बेधड़क कहीं भी जाता हूँ

मैं दिलकी बाते करता हूँ
मैं दिलसे तुम्हे सुनाता हूँ
अपनी तो छोटी हस्ती है
मैं रूखी रोटी खाता हूँ

मैं लिखके बातें करता हूँ
मन ही मन में गुर्राता हूँ
मीठी पुड़िया से काम चले
तो टीका नहीं लगाता हूँ

Wednesday, November 29, 2017

उम्र बाकी बची थोड़ी

उम्र बाकी बची थोड़ी
बहुतसे काम करने हैं
बचे जो चंद सपने हैं
जहाँ के नाम करने हैं .
बड़ी उजाड़ बस्ती है -
यहाँ उजड़े बसाने हैं
गये कुछ रूठके मुझसे
उन्हें वापिस बुलाने हैं .
बहूत से बीज बोने हैं
नए गुलशन सजाने हैं
किसीकी आँखके आंसू
पिरो माला बनाने हैं
कई सूनी निगाहों में
नए सपने जगाने हैं
बहुत सी बात करनी हैं
किये वादे निभाने हैं .
मिले खुदसे हुआ अरसा
यहाँ मिलने मिलाने में
झोपड़े फूंक कर अपने
प्रभुके घर भी जाने हैं .

Friday, November 10, 2017

बेकार जैसा भी नहीं हूँ

सहज जैसा भी नहीं
दुश्वार जैसा भी नहीं हूँ
रंजिशों में भी नहीं पर 
प्यार जैसा भी नहीं हूँ

कर रहा हूँ प्यार पर
इकरार जैसा भी नहीं हूँ
शहद जैसा भी नहीं पर
खार जैसा भी नहीं हूँ 

आप जैसा भी नहीं
संसार जैसा भी नहीं हूँ
आजमा के देख लो
व्यवहार जैसा भी नहीं हूँ

रूठता भी मैं नहीं
मनुहार जैसा भी नहीं हूँ
सार जैसा कुछ नहीं -
बेकार जैसा भी नहीं हूँ

Friday, January 13, 2017

रुका आँखों का पानी है

तुम्हारी बात सुननी है
 व्यथा अपनी सुनानी है
ख़त्म होती नहीं यारो
बड़ी अनबुझ पहली है
बड़ी अद्भूत कहानी है

बड़ी रोई है छिपछिपके
 मेरी ये जिंदगानी है
बहाये नीर जीवन भर
बड़ी खामोश ये आँखें
अभी तो मुस्कुरानी है

दिलासा देने आये हो
अभी कुछ देर तो ठहरो
अभी तो रात बाकी है
बड़ी मुश्किल से सुखा है
रुका आँखों का पानी है